Ayurveda For Life Style

आयुर्वेद दिनचर्या  

आयुर्वेद का प्रमुख उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगों से बचाव करना है । स्वास्थ्य का बना रहना और बिगाड़ना , शरीर के त्रिदोष की स्थिति पर निर्भर करता है । आपको बता दे की दिन के अलग अलग समय तथा वर्ष की अलग अलग दोषों का संचय , प्रकोप और शामन स्वाभाविक रूप से होता है । इन दोषों को समय अवस्था में बनाये रखने के लिए ही आयुर्वेद में दिन और रात्रि के आचरण (आहार – विहार) का उल्लेख किया गया है, जिसे स्वस्थ्यवृत्त के नाम से जाना जाता है। इनके अनुसार आचरण करने से जहाँ स्वास्थ्य की रक्षा होती है , वहीं रोगों के आक्रमण से भी बचा जा सकता है।

जागरण :

स्वस्थ व्यक्ति को ब्राम्हा मुहूर्त में ( सूर्योदय से 2 घंटे पूर्व) उठ जाना चाहिए। यह समय सुबह मन जाता है , क्योंकि वातावरण में हर जगह शांति , सात्विकता, स्वच्छता और प्रसन्नता छाई रहती है। जागते ही अपने इष्ट देव का स्मरण करके प्रार्थना करनी चाहिए । इस समय उठने पर शौच , स्नान , योगाभ्यास व व्यायाम आदि नित्यकर्म करने का भी पर्याप्त समय मिल जाता है । अतः रोग नहीं होते और आपके आयु की रक्षा होती है।

मुख धोना :

बिस्तर छोड़ने के तुरंत बाद , सभी ऋतुओं में स्वच्छ जल से मुख धोना चाहिए । इससे आँख ,नाक , मुख तथा चेहरे पर जमी हुई गन्दगी साफ़ हो जाती है तथा सुस्ती दूर हो जाती है।

खाली पेट जल पीना :

हर व्यक्ति को रोज़ सुबह तथा हर मौसम में मुख्य धोने के पश्चात खली पेट काम से कम एक गिलास और अधिक से अधिक 4 गिलास जल अवश्य पीना चाहिए । यह जल रात को एक विशेष बर्तन में (विशेषकर तांबे के बर्तन में) भरकर रख देना चाहिए और सुबह सुबह इस जल का सेवन लाभदायक होता है। इससे मल तथा मूत्र का त्याग ठीक प्रकार से होता है, जिससे अनेक प्रकार के विषैले तत्व बहार निकलते है और अनेक रोगों से छुटकारा मिलता है। इसे ही उषः पान कहा गया है । सुबह उठकर जो जल पिया जाता है , उसे बैठकर ही पीना चाहिए । खड़े खड़े पानी पीने से घुटने में या जोड़ो में दर्द हो सकता है।

मल त्याग :

इसके पश्चात मल त्याग के लिए जाना चाहिए । प्रत्येक व्यक्ति को प्रातः ही नियमित रूप से इसकी आदत बनानी चाहिए । आज के इस तनावपूर्ण और व्यस्त जीवन में बहुत से लोगों को नियमित रूप से तथा समय पर मल के वेग का अनुभव नहीं होता ।इसके अनेक कारण हैं, – जैसे देर रात्रि में खाये गये भोजन का पाचन न होना, पूरी नींद न ले पाना , बहुत अधिक चिंताग्रस्त , क्रोधी , संवेदनशील और असंतुलित स्वभाव आदि का आया जाना आदि । कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए, जैसे – वातकारक पदार्थ , भारी दालें- राजमा , चने , उड़द, व पिज़्ज़ा , बर्गर, चाऊमीन व तले हुए पदार्थ कम मात्रा में लेने चाहिए । पत्ते वाली सब्जियां – पालक , मेथी तथा बथुआ आदि तथा घीया , तोरी , अमरुद अंगूर, पपीता एवं अन्य रेशेदार पदार्थ अधिक मात्रा में सेवन करने चाहिए। कब्ज़ व अन्य उदर रोगों को स्थायी रूप से दूर करने के लिए कपालभाति प्राणायाम का अभ्यास प्रातः खली पेट करना आवश्यक है ।

दातुन या दांत साफ करना :

कटु ,तिक्त या कषाय रस वाले औषधीय वृक्षों की अंगुली जितनी मोती 6 इंच लगभग लंबी, सीधी, छिलकेयुक्त ताज़ी शाखा को लेकर आगे के लगभग 1-2 इंच के भाग को डांट से चबाकर कूंची (ब्रश) बनाकर उससे साफ करते हैं । रोगशमन कि दृष्टि से बाबुल, करंज, मालती, असन , नीम, अपामार्ग आदि वृक्षों की टहनी को प्रयोग में लाया जाता है। अपच, श्वास, ज्वर, लकवा , तृष्णा (अधिक प्यास) मुखपाक (मुंह में छाले) और हृदय ,नेत्र ,सिर ,और कान के रोग होने पर दातुन करने की मनाही की गई है ।इन अवस्थाओं में दातुन करने से रोग बढ़ने की आशंका रहती है।

गण्डूष / कवल :

यदि यात्रा या अन्य किसी कारणवश दांत साफ करने की सुविधा न हो तो पानी से कुल्ले व गरारे भी किये जा सकते है ।इससे भी कुछ हद तक जीभ और दांतों में जमा हुआ मैल एवं मुंह की दुर्गन्ध दूर हो जाती है । सामान्यतः दाँत साफ करके मुख में तिल सा सरसों  का तेल लेकर दाएं बाएं घुमाना चाहिए। इससे दांत और मसूड़े मजबूत होते हैं, दांत दर्द नहीं होता , ठंडा गर्म पदार्थ दांतो में नहीं लगता , खटास से दंत हर्ष नहीं होता , सख्त से सख्त पदार्थ भी चबाया जा सकता है , आवाज़ ऊँची और गंभीर होती है।

सिर पर तेल लगाना :

आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य को नित्यप्रति तेल लगाना चाहिए। इसके लिए नारियल, तिल , जैतून व सरसों का तेल उपयोगी होता है । नारियल का तेल शीतल होता है , अतः इसका उपयोग गर्मी में ही करना चाहिए । सिर में तेल लगाने से बालों का गिरना , सफ़ेद या भूरा होना, गंजापन , सिर दर्द , सिर को त्वचा का फटना और अन्य वात के रोग नष्ट होते है। तिल का तेल सिर पर लगाने से नींद अच्छी और गहरी आती है । तेल लगाने के बाद कंघी करने से बाल सुन्दर तथा स्वच्छ होते हैं।

तेल मालिश :

जिस प्रकार घड़े, सुखी चमड़ी एवं रथ और मोटर गाड़ियों के पास की धुरी लगाने या डालने से वे मुलायम और मजबूत होते हैं , उसी प्रकार शरीर पर तेल की मालिश करने से शरीर शक्तिशाली और त्वचा मुलायम होती है, जिनमें पित्त की गर्मी होती है। मालिश करने से जहाँ त्वचा को आरोग्य मिलता है , वहीं मांसपेशियां मजबूत हो जाती है । स्नायु तंत्र एवं नाड़ी तंत्र की दुर्बलता तथा संधिवात में अभ्यंग अत्यंत लाभप्रद है।

कान में तेल डालना :

आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य को कान में प्रतिदिन तेल डालना चाहिए । इससे ऊँचा सुनना, बहरापन , कान के रोग (वात से होने वाले) , मन्यास्तम्भ (torticollis) जैसे रोग नहीं होते। स्वस्थ अवस्था में कान में तेल डाल कर उसे 2 मिनट तक धारण करना चाहिए ।यदि कान में दर्द हो तो ,तो तेल डालने के बाद कान के बाहर मूल में हल्के हाथ से मालिश करते हुए तब तक तेल रहने देना चाहिए , जब तक दर्द समाप्त न हो जाये ।

व्यायाम :

जिस क्रिया से शरीर में आयास (श्रम थकावट) उत्पन्न हो उसे व्यायाम कहते है। व्यायाम शरीर में स्थिरता और बल पैदा करता है। व्यायाम नित्यप्रति हर मौसम में करना चाहिए । हेमंत , शिशिर और वसंत ऋतु में अपनी आधी शक्ति तक अर्थात जब माथे पर या बगल में पसीना अनुभव हो तब तक करना चाहिए । ग्रीष्म , वर्षा और शरद में इससे भी कुछ कम करना चाहिए , क्योंकि ग्रीष्म , वर्षा आदि में वात का संचय और प्रकोप होता है। आयुर्वेद में शक्ति से अधिक व्यायाम का निषेध है।

उबटन :

चूर्ण या कल्क (lotion) से शरीर को मालिश करना उबटन कहा जाता है। स्नान से पहले इसका प्रयोग भी लाभकारी है। उबटन के लिए सरसों का चूर्ण (powder) , दूध , बेसन, तिल-तेल , या दही की मलाई तथा सरसों का तेल प्रयोग में लाया जाता है।

स्नान :

आयुर्वेद शास्त्रों में शरीर को स्वच्छता के लिए प्रतिदिन स्नान करने का विधान किया गया है। स्नान आयु को बढ़ने वाला होता है, बल की वृद्धि करता है तथा थकावट , खुजली , त्वचा की गंध, पसीना , दुर्गन्ध, सुस्ती, प्यास और जलन को दूर करता है। नेत्र , मुख और कान के रोग में, दस्त, पेट में अफरा , पीनस होने पर रथ भोजन के तुरंत बाद स्नान नहीं करना चाहिए । इससे रोग बढ़ने की आशंका रहती है।

वस्त्र धारण :

स्नान के पश्चात सदा स्वच्छ , सुन्दर और सौम्य वस्त्र पहनने चाहिए ।इससे शरीर की सुन्दरता और आकर्षण बढ़ता है और आयु की वृद्धि होती है। वस्त्र अशुभ से तथा ऋतु के कुप्रभाव से बचाता है ।

इत्र व सुगंध (perfumes) :

मनुष्य को समय एवं ऋतु के अनुसार फूल मालाओं और प्राकृतिक इत्रों का प्रयोग भी करना चाहिए ।आयुर्वेद में हर दोष को उसके अनुरूप सुगंध के द्वारा सम अवस्था में लाया जाता है। नाक द्वारा जो खुशबू सूंघी जाती है व पहले नासा ऊतकों ( nasal tissue) में पाई जाने वाली आद्रता में घुल जाती है फिर गंध कोशिका (olfactory cells) के द्वारा सीधे मस्तिष्क के अधःश्चेतन (hypothalamus) भाग में पहुंचती है। इस तरह कैदी सारी शारीरिक क्रियाओं को सुगंध द्वारा नियंत्रण में रख सकते हैं जैसे की ताप , प्यास , भूख , रक्त में शर्करा का स्तर (blood sugar level) , विकास (growth) , सोना , जागना, सम्भोग की इच्छा , याददाश्त और मन की भावनाएं जैसे गुस्सा , प्रसन्नता आदि।

आभूषण , मणि आदि धारण करना :

सोने, चांदी आदि से बने आभूषण पहनने से शरीर की सुंदरता और आकर्षण तो बढ़ता ही है साथ ही प्रसन्नता , सफलता शरीर व चेहरे की चमक, मंगल और आयु भी बढ़ते है। इन सबके परिणामस्वरूप मनुष्य की जीवनी शक्ति भी बढ़ती है। इन आभूषणों के अलावा रत्न (हीरा , पन्ना , गोमेद आदि) , सिद्ध – मंत्र तथा सहदेवी आदि औषधियों को भी धारण करते रहने चाहिए। इससे विष का भय कम रहता है तथा ब्रह्मांड की नकारात्मक एवं असुरी शक्तियों से रक्षा होती है। अलग अलग आभूषण व रत्नादि धारण करना स्पर्श चिकित्सा का एक अंग है। जब इनका त्वचा से स्पर्श होता है तब यह विद्युतचुम्बकीय प्रभाव (electromagnetic effect) से शरीर की कोशिकाओं व  ऊतकों पर उपचारात्मक प्रभाव डालते हैं।

चप्पल व जूते पहनना :

पैरो में चप्पल पहनने से गर्मी व सर्दी आदि से पैरो की रक्षा होती है, पैरो को आराम मिलता है, काँटों , रेंगने वाले जन्तुओं व रोगाणुओं से सुरक्षा होती है । इस बात का ध्यान रहे चप्पल आदि का ठीक माप के और सुविधाजनक हों। अधिक ऊँची एड़ी वाले जूते , चप्पल असुविधाजनक होने के साथ साथ कुछ समस्याएं भी उत्पन्न कर सकते है। जूते चप्पल मौसम के अनुकूल होने चाहिए । इससे पैरो को बल मिलता है तथा व्यक्ति आसानी से चल फिर सकता है ।

भोजन :

आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य को बनाये रखने में भोजन का बहुत महत्व है। भोजन सदा ही सही मात्रा में और उचित समय पर तथा अनुकूल पदार्थों का सेवन करना चाहिए।भोजन की मात्रा आदि व्यक्ति की पाचन शक्ति और चयापचय – शक्ति   निर्भर करती है।

आयुर्वेद के अनुसार कैसे आचरण रखें ?

जीवन में स्वस्थ और सुखी रहने के लिए प्रत्येक मनुष्य को आध्यात्मिक व मर्यादित आचरण का पालन करना चाहिए । धर्म, अर्थ और काम (इंद्रिय सुख) का सेवन इस तरह करना चाहिए की इन तीनों में आपसी विरोध न हो । सदा सत्य बोलने चाहिए। चींटी, कीड़े मकोड़े आदि तुच्छ जंतुओं को भी आने सामान देखना चाहिए । निर्धनता , रोग और शोक से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए सदा तैयार रहना चाहिए। देवता , गाय , ब्राम्हण (विद्वान) , वृद्ध, राजा और अतिथि का आदर करना चाहिए ।दूसरों की संपत्ति पर और अधिकार नहीं जमाना चाहिए और न ही किसी की संपत्ति या परस्त्री आदि की इच्छा करनी चाहिए । किसी भी प्रकार के पाप कर्म से दूर रहना चाहिए । दुष्ट व्यक्ति के प्रति भी दुष्ट व्यवहार नहीं करना चाहिए । दूसरों के गुप्त बातों का खुलासा नहीं करना चाहिए । विश्वासघाती , कपटी , अधर्मी , दुराचारी , कंजूस व कुटिल स्वभाव के लोगों से दूर रहे । कल्याण करने वाले लोगों व मित्रों से सलाह लेनी चाहिए और अकल्याण करने वालों से सदा सावधान  रहें।

आयुर्वेदका उपदेश

ब्रह्म मुहूर्त |Brahma muhurata

सूर्योदय से डेढ़ घंटे पूर्व उठने से आप सूर्य की लय के साथ समकालिक हो सकते हैं | आयुर्वेद ब्रह्म मुहूर्त की अनुशंसा करता है जिसका अर्थ है ब्रह्म का समय या शुद्ध चेतना या शुभ और प्रातः काल के इस समय उठना सर्वश्रेष्ठ माना गया है|

सूर्योदय से देड घंटे पूर्व वातावरण में विशाल ऊर्जा की गति भर जाती है| फिर सूर्योदय के आधे घंटे पूर्व दूसरी ऊर्जा की धूम वातावरण में भोर करती है| आशा, प्रेरणा और शांति इस समय प्रकट होती है| यह समय ब्रह्म ज्ञान (ध्यान और स्वाध्याय ), सर्वोच्च ज्ञान और शाश्वत सुख प्राप्त करने के लिये सर्वश्रेष्ठ माना जाता है| इस समय वातावरण शुद्ध,शांत और सुखदायक होता है और निद्रा के उपरांत मन में ताज़गी होती है|

इस समय ध्यान करने से मानसिक कृत्य में सुधार होता है| यह सत्वगुण बढ़ाने में सहायक है और रजोगुण और तमोगुण से मिलने वाली मानसिक चिडचिडाहट या अति सक्रियता और सुस्ती से निदान देता है|

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श्वास की शक्ति |Power of Breath

यह देखे कि कौनसी नासिका से श्वास का प्रवाह अधिक है| आयुर्वेद के अनुसार दाहिनी नासिका सूर्य पित्त है और बाईं नासिका चंद्र पित्त है| मस्तिष्क का दाहिना भाग रचनात्मक कार्यों को नियंत्रित करता है और बायां हिस्सा तार्किक और मौखिक कृत्यों को नियंत्रित करता है| शोध के अनुसार जब कोई बाईं नासिका से श्वास लेता है तो मस्तिष्क का दाहिना भाग अधिक हावी होता है और इसका विपरीत भी|

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सकारात्मक तरंगे |Positive Vibrations

प्राचीन परंपरा का पालन करते हुये अपने हथेली की रेखाओं को देखे और धन, ज्ञान और शक्ति की देवियों को याद करे| उंगलियों के ऊपर के भाग को अंगूठे से गोलाकार सुखदायक लय में घिसे – दाहिना दक्षिणावर्त गोलाकार और बायां वामावर्त गोलाकार लय में| हथेली को उंगली के ऊपर के भाग से घिसे और दाहिनी कलाई को दक्षिणावर्त लय में घुमाये और बायीं कलाई को वामावर्त लय में घुमाये| शरीर के जिस भाग में श्वास का प्रवाह अधिक हो पहले उस भाग की हथेली को चूमे और फिर दूसरी हथेली को चूमे| (चुंबन ऊर्जा प्रदान करती है| अपनी हथेली को चूमने से आप अपने सबसे प्रभावकारी शस्त्र आत्म अभिव्यक्ति को उत्तम कंपन प्रदान करते हैं|) अपने दोनों हाथों को घिसे फिर दोनों हथेली को धीरे धीरे चेहरे, सिर,कंधे,हाथ और पैरों की ओर ले जाये जिससे ऊर्जा का एक कवच निर्मित हो जाता है और पूरे दिन नकारात्मक प्रभाव से संरक्षण मिलता है|

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रक्षा मंत्र |Protection Mantra

रक्षा मंत्र का मंत्रोचारण करे जो इस सरल लेकिन प्रभावकारी सुबह की दिनचर्या का हिस्सा है| मंत्रोचारण के उपरांत कुछ क्षण शांत और खाली मन के साथ बैठे|

कर अग्रे वसते लक्ष्मी

(हाथों के आगे भाग में अर्थात उंगली के ऊपर के भाग में धन की देवी लक्ष्मीजी का वास होता है|)

कर मध्ये च सरस्वती

(हाथ में मध्य भाग में अर्थात हथेलियों में कला और ज्ञान की देवी सरस्वती का वास होता है|)

कर मुले वसते गोविंदम

(हाथ के आखिर के भाग में अर्थात मूल या कलाई में भगवान श्रीकृष्ण का वास होता है|)

प्रभाते शुभ कर दर्शनम

(सुबह हाथों को देखना शुभ होता है|)

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सकारात्मक कदम |Positive Step

बिस्तर छोड़ते समय नासिका के जिस भाग में श्वास का प्रवाह तेज या हावी हो उस भाग के पैर को जमीन पर पहले रखे|

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सफाई |Clean Up

ठंडे पानी से कुल्ला कर ले| जल विद्युत कंडक्टर होता है और संवेदनशील ऊतकों में कभी भी जलन पैदा नहीं कर सकता| ठंडे पानी से हाथ,चेहरा ,मुंह और आँखों को धो ले| नाक,दांत और जीभ को साफ कर ले|

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ध्यान और व्यायाम |Meditate and Exercise

विश्राम से – प्राणायाम तब तक करे जब तक दोनों नासिकाओं से श्वास बराबरी से प्रवाहित होना शुरू हो जाये| अपनी ऊर्जा को ह्रदय के चक्र या तीसरी आँख की ओर केंद्रित करके ध्यान करे| छोटी और धीमी गति से सुबह की ताज़ी हवा में चले|अपने आप को सरल और सुखदायक दृश्यों में घेर ले खास तौर सफेद वस्तुओं जैसे ताज़े और सुगंधदार फूल जिनके सूक्ष्म रंग हो|

व्यायाम या शारीरक कसरत में सामान्यता कुछ योग मुद्रायें होती है जैसे सूर्यनमस्कार और श्वास प्रक्रियायें जैसे नाड़ीशोधन प्राणायाम| लेकिन इसमें सैर करना और तैरना भी सम्मलित हो सकता है| सुबह के व्यायाम से शरीर और मन की अकर्मण्यता समाप्त होती है, पाचन अग्नि मजबूत होती है, वसा में कमी आती है| आपके शरीर में अच्छे प्राण की वृद्धि हो जाने से आपको हल्केपन और आनंद की अनुभूति होती है| घोर परिश्रम वाले व्यायाम की तुलना में आपकी १/४ या १/२ क्षमता के अनुसार ही व्यायाम करने की अनुशंसा की जाती है|

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अपने आप की देखरेख करे |Pamper Yourself

अपने शरीर की तिल के तेल से मालिश करे (अभ्यंग)| खोपड़ी, कनपटी, हाथ और पैर की २-३ मिनिट की मालिश पर्याप्त है|

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ठीक से स्नान करे |Bathe Right

ऐसे पानी से स्नान करे जो न तो ज्यादा गर्म या ठंडा हो|

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दोपहर का समय |Noon - Time

दोपहर का भोजन १२ से १ बजे के बीच करना चाहिये क्योंकि यह समय उस उच्च समय से मेल खाता जो पाचन के लिये जिम्मेदार है| आयुर्वेद पूरे दिन में दोपहर के भोजन को सबसे भारी होने की अनुशंसा करता है| भोजन के उपरांत थोड़े देर चलना अच्छा होता है जिससे भोजन के पाचन में सहायता मिलती है| हल्की नींद का अलावा नींद को टालना चाहिये क्योंकि आयुर्वेद में दिन में सोना प्रतिबंधित है|

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संध्या का समय |Twilight - Zone

दिन और रात के संतुलन के लिये यह विशेष समय है| यह समय शाम की प्रार्थना और ध्यान के लिये होता है|

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रात्रि का भोजन |Dinner

रात्रि का भोजन शाम को ६-७ बजे करना चाहिये| यह दोपहर के भोजन से हल्का होना चाहिये| रात्रि का भोजन सोने से करीब तीन घंटे पहले लेना चाहिये जिससे भोजन के पाचन के लिये पर्याप्त समय मिल सके| रात्रि के भोजन के तुरंत बाद भारी पेट से साथ सोने को टालना चाहिये| भोजन के बाद १०-१५ मिनिट चलने से पाचन में सहायता मिलती है|

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सोने का समय |Bedtime

रात्रि १०.३० बजे तक सो जाने का सबसे आदर्श समय है| तंत्र को शांत करने के लिये, सोने से पहले पैर के तलवे की मालिश की जा सकती है|